ये है वो असली हीरो

आंध्र प्रदेश के सीतारामपुरम में साल १९९२ में जन्में श्रीकांत बोला, जिसने एक ऐसे परिवार में जन्म लिया था, जिन्हें यह तक पता चल पाता था की उनको शाम को खाना नसीब होगा भी या नहीं। ऊपर से भगवान भी श्रीकांत को इस रंगबिरंगी दुनिया को देखने के लिए आँखों की रोशनी देना भी भूल गये।
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दृष्टिहीन होने के वजह से बचपन से ही समाज के भेदभाव वाले व्यव्हार का सामना करना पड़ता था। अपने घर से ५ किलोमीटर की दुरी तय करके साधारण बच्चों के बीच स्कूली भेदभाव के बीच, इनके पिता ने इन्हे हैदराबाद के एक दिव्यांग बच्चों के स्कूल में भर्ती करवा दिया। जहाँ इन्होंने १० वी में ९० प्रतिशत से भी ज्यादा अंक लाये। इतने अच्छे नंबर लाने के बावजूद श्रीकांत को उनके मन मुताबिक विज्ञानं की पढाई के लिए कोई भी बोर्ड स्वीकृति नहीं दे रहा था। कहते थे की नेत्रहीन लोग विज्ञानं की पढाई नहीं कर सकते।


सरकार से ६ महीनों की लड़ाई में आखिर इन्हें अपने दम पर विज्ञानं की पढाई करने की अनुमति मिल गयी। इसके बाद श्रीकांत ने दिन रात एक कर दिये और १२ वी के बोर्ड की परीक्षा में ९८ प्रतिशत से पास हो गये। अब श्रीकांत इंजीनियरिंग करना चाहते थे। पर इस बार भी इन्हें भारत में कहीं भी इंजीनियरिंग में दाखला नहीं मिला तो इन्होंने अमेरिका के कुछ प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलजों में आवेदन दिया और एमआयटी कॉलेज में पढाई कर उस स्कूल के इतिहास में सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिहीन विद्यार्थी बने।
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पढाई के बाद, अमेरिका में अपने सुनहरे भविष्य को छोड़कर वे भारत लौट आये और यहाँ आकर उन्होंने शारारिक रूप से कमजोर लोगों की सेवा करना प्रारम्भ कर दिया। जिससे समाज में उनको भी एक सम्मानजनक स्थान दिलाया जा सकें। लगभग ३००० लोगों की मदद करने के बाद इन्हें एहसास हुआ के ये लोग अपनी प्रतिदिन की जरूरतों को कैसे पूरा करेंगे। तब इन्होंने बोलंट इंडस्ट्रीज नामक एक कंपनी की स्थापना की और कई लोगों को रोजगार प्रदान किया।अपने इस संकल्प की वजह से श्रीकांत की इस कंपनी का साल का टर्नओवर ५० करोड़ के आस पास है। उनकी ऐसी सिर्फ एक नहीं, कुल चार कंपनिया है जो इस काम को आगे बढ़ा रहे है। अपनी मेहनत और विश्वास की वजह से लोगों के प्रेरणा बन चुके श्रीकांत बोला जैसे लोगों को हम सलाम करते है।

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