७ अजूबों में शामिल करने लायक है ये जगहें - फिर भी नहीं है शामिल

७ अजूबों में शामिल करने लायक है ये जगहें - फिर भी नहीं है शामिल 
दोस्तों, दुनिया के सात अजूबों के बारे में हम सभी जानते है| लेकिन इस दुनिया में ऐसे कई और जगहें है, जो सच में अपने आप में किसी अजुबे से कम नहीं है| तो चलिये, आज हम आपको कुछ ऐसी ही जगहों की जानकारी देते है, जो दुनिया के ७ अजूबों में शामिल होने के हकदार है| 
banaue rice terraces
बनाऊ राइस टेरेसेस
फिलीपीन्स के इफुगाओ नामक जगह के पहाड़ों पर करीब २००० साल पहले यह खेत यहाँ के निवासियों के पूर्वजों ने बनवाये थे| यहाँ के लोग इसे दुनिया का ८ वां अजूबा भी कहते है| समुन्द्र तल से लगभग १५०० मीटर यानी ४९०० फ़ीट ऊपर और १० हजार ३६० स्क्वायर किलोमीटर की जगह पर बनी हुई है|
banaue rice terraces
इनको सींचने के लिए प्राचीन समय में ऊपर जंगलों में बनाये गये पानी के श्रोतों से होती है| ऐसा अंदाज़ा लगाया गया है की इन दिखने वाली सीढ़ियों को अगर एक के बाद एक कतार में लगा दिया जाये तो यह पृथ्वी के आधा चक्कर लगाने जितने हो जायेंगे| 
banaue rice terraces
आज के समय में भी यहाँ के निवासी इन् खेतों में चावल और सब्जियों की खेती वही पुराने तरीकों से करते है| यह आज भी उसी तरीके से काम करता है जिस तरीके से २००० साल पहले किया करता था| हैरानी की बात यह है कि इन खेतों को उस समय बिना आधुनिक उपकरणों से बनाया गया था| 
leshan giant buddha
लेशान जायंट बुद्धा 
चीन के सिचुआन नामक जगह पर स्थित यह बौद्ध प्रतिमा ७१ मीटर यानी २३३ फ़ीट ऊँची है, जिसे साल ७१३ से साल ८०३ के बीच बनाया गया था| साल ७१३ में इसे बनाने की शुरुवात एक चायनीस मोंक ने की थी, जिनका नाम हाई टोंग था| 
leshan giant buddha
इस मूर्ति को यहाँ इसीलिए बनाया गया था ताकि इस मूर्ति के सामने स्थित तेज बहती नदियों को शांत कर सके, जो नदी में सफर करने वाले व्यापारियों के जहाजों के लिए उफान खड़े करती थी| हाई टोंग की मृत्यु के बाद और पैसों की कमी के चलते इस मूर्ति का काम ७० सालों तक बंद रहा| ७० साल बाद वेई गाओ नामक व्यक्ति ने इसका काम शुरू करवाकर साल ८०३ में संपन्न किया था| 
leshan giant buddha
इस मूर्ति की चौड़ाई करीब ७८ फ़ीट की है और २७ फ़ीट की तो सिर्फ उँगलियाँ ही है| किसी पर्वत को बीच में से काटकर इस तरह की कलाकृति बनाना और वह भी किसी आधुनिक उपकरण के बिना, यह किसी अजुबे से कम नहीं है| १३०० साल पहले इस मूर्ति को इस तरह से बनाया गया है, जिससे इसे पहाड़ों से गिरने वाले पानी से कोई नुक्सान न पहुंचे| 
kailashnath mandir ellora
कैलाशनाथ मंदिर (एलोरा)
भारत के महाराष्ट्र में एलोरा नामक जगह पर, जो की एलोरा गुफाओं के नाम से भी प्रसिद्द है, यहाँ बना कैलाशनाथ मंदिर पहाड़ों को कांटते हुए बनाया गया भगवान शिवजी का यह अनोखा मंदिर एलोरा की ३२ गुफाओं में से १६ वी गुफा में है| 
यह दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जो किसी पहाड़ को कांटते हुए नक्काशी करके बनाया गया है, जिसे कभी दोबारा नहीं बनाया जा सकता| राष्टकूटा राजवंश के योगदान से बना यह कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा में स्थित ३४ मंदिरों में से एक है| इस मंदिर की लम्बाई १६४ फ़ीट है और चौड़ाई १०९ फ़ीट की है| 
kailashnath temple ellora
विशेषज्ञों के मुताबिक इस मंदिर को बनाते समय लगभग ४ लाख टन चट्टानों को खोद कर निकला गया होगा और इस कार्य में करीब १०० साल का वक़्त लगना चाहिये था| पर ताज्जुब की बात यह है कि इस मंदिर का निर्माण १८ साल में ही पूरा कर लिया गया था| 
kailashnath temple ellora
कैलाशनाथ मंदिर में कई गुप्त रास्तें, पानी जमा करने और निकासी की तकनीक के साथ कई खूबसूरत नक्काशियां है, जिसे सिर्फ एक ही पहाड़ को कांटते हुए बनाया गया है| 
borobudur temple
बोरोबुदुर 
इंडोनेशिया के मजलांग नामक जगह पर स्थित और ९ वी शताब्दी में बना यह दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर है| चौरस आकार में बना यह मंदिर चारों तरफ से ४०३ फ़ीट की लम्बाई और चौड़ाई का है| एक के ऊपर एक ९ परतों में बना इस मंदिर में ५०४ बुद्ध की मूर्तियां है और हर एक मूर्ति एक स्तूप के अंदर मौजूद है| 
borobudur temple
अजीब बात यह है कि ९ परतों में बैठाया गया यह मंदिर बनाते समय किसी भी चिपकाने वाले पदार्थ जैसे सीमेंट और चुना इनका बिलकुल भी उपयोग नहीं किया गया है| ये सारे पत्थर एक के ऊपर एक अपने अपने वजन के वजह से चिपके हुए है| 
borobudur temple
एक समय यह मंदिर एक ज्वालामुखी के फटने पर उस ज्वालामुखी की राख में दबकर गुम हो गया था| 
इसके अलावा इस मंदिर पर कई और आपदाएं भी आयी पर यह मंदिर ज्यों का त्यों बना हुआ है| साल १८१५ में इस मंदिर को एक ब्रिटिश खोजकर्ता ने फिर से खोज निकाला था| साल १९८५ इस मंदिर पर हुए आतंकवादी हमले से भी यह इमारत नहीं गिरी थी|   साल २००६ में इस क्षेत्र में आये भूकंप, जिसकी त्रीवता ६.२ तक थी, वह भी मंदिर का कुछ नहीं बिगाड़ पाया|    

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