April 17, 2021

७ अजूबों में शामिल करने लायक है ये जगहें – फिर भी नहीं है शामिल

७ अजूबों में शामिल करने लायक है ये जगहें – फिर भी नहीं है शामिल

दुनिया के ७ अजूबों के बारे में हम सभी जानते है| लेकिन इस दुनिया में ऐसे कई और जगहें है, जो सच में अपने आप में किसी अजुबे से कम नहीं है| तो चलिये, आज हम आपको कुछ ऐसी ही जगहों की जानकारी देते है, जो दुनिया के ७ अजूबों में शामिल होने के हकदार है|
banaue-rice-terraces-७-अजूबों-में-शामिल-करने-लायक-है-ये-जगहें-फिर-भी-नहीं-है-शामिलबनाऊ राइस टेरेसेस

फिलीपीन्स के इफुगाओ नामक जगह के पहाड़ों पर करीब २००० साल पहले यह खेत यहाँ के निवासियों के पूर्वजों ने बनवाये थे| यहाँ के लोग इसे दुनिया का ८ वां अजूबा भी कहते है| समुन्द्र तल से लगभग १५०० मीटर यानी ४९०० फ़ीट ऊपर और १० हजार ३६० स्क्वायर किलोमीटर की जगह पर बनी हुई है|banaue-rice-terraces-७-अजूबों-में-शामिल-करने-लायक-है-ये-जगहें-फिर-भी-नहीं-है-शामिल

इनको सींचने के लिए प्राचीन समय में ऊपर जंगलों में बनाये गये पानी के श्रोतों से होती है| ऐसा अंदाज़ा लगाया गया है की इन दिखने वाली सीढ़ियों को अगर एक के बाद एक कतार में लगा दिया जाये तो यह पृथ्वी के आधा चक्कर लगाने जितने हो जायेंगे|banaue-rice-terraces-७-अजूबों-में-शामिल-करने-लायक-है-ये-जगहें-फिर-भी-नहीं-है-शामिलआज के समय में भी यहाँ के निवासी इन् खेतों में चावल और सब्जियों की खेती वही पुराने तरीकों से करते है| यह आज भी उसी तरीके से काम करता है जिस तरीके से २००० साल पहले किया करता था| हैरानी की बात यह है कि इन खेतों को उस समय बिना आधुनिक उपकरणों से बनाया गया था|

लेशान जायंट बुद्धा

चीन के सिचुआन नामक जगह पर स्थित यह बौद्ध प्रतिमा ७१ मीटर यानी २३३ फ़ीट ऊँची है, जिसे साल ७१३ से साल ८०३ के बीच बनाया गया था| साल ७१३ में इसे बनाने की शुरुवात एक चायनीस मोंक ने की थी, जिनका नाम हाई टोंग था|leshan-giant-buddha-७-अजूबों-में-शामिल-करने-लायक-है-ये-जगहें-फिर-भी-नहीं-है-शामिलइस मूर्ति को यहाँ इसीलिए बनाया गया था ताकि इस मूर्ति के सामने स्थित तेज बहती नदियों को शांत कर सके, जो नदी में सफर करने वाले व्यापारियों के जहाजों के लिए उफान खड़े करती थी| हाई टोंग की मृत्यु के बाद और पैसों की कमी के चलते इस मूर्ति का काम ७० सालों तक बंद रहा| ७० साल बाद वेई गाओ नामक व्यक्ति ने इसका काम शुरू करवाकर साल ८०३ में संपन्न किया था|kailashnath-temple-ellora-७-अजूबों-में-शामिल-करने-लायक-है-ये-जगहें-फिर-भी-नहीं-है-शामिल

इस मूर्ति की चौड़ाई करीब ७८ फ़ीट की है और २७ फ़ीट की तो सिर्फ उँगलियाँ ही है| किसी पर्वत को बीच में से काटकर इस तरह की कलाकृति बनाना और वह भी किसी आधुनिक उपकरण के बिना, यह किसी अजुबे से कम नहीं है| १३०० साल पहले इस मूर्ति को इस तरह से बनाया गया है, जिससे इसे पहाड़ों से गिरने वाले पानी से कोई नुक्सान न पहुंचे| 

कैलाशनाथ मंदिर (एलोरा)

भारत के महाराष्ट्र में एलोरा नामक जगह पर, जो की एलोरा गुफाओं के नाम से भी प्रसिद्द है, यहाँ बना कैलाशनाथ मंदिर पहाड़ों को कांटते हुए बनाया गया भगवान शिवजी का यह अनोखा मंदिर एलोरा की ३२ गुफाओं में से १६ वी गुफा में है|

यह दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जो किसी पहाड़ को कांटते हुए नक्काशी करके बनाया गया है, जिसे कभी दोबारा नहीं बनाया जा सकता| राष्टकूटा राजवंश के योगदान से बना यह कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा में स्थित ३४ मंदिरों में से एक है| इस मंदिर की लम्बाई १६४ फ़ीट है और चौड़ाई १०९ फ़ीट की है|विशेषज्ञों के मुताबिक इस मंदिर को बनाते समय लगभग ४ लाख टन चट्टानों को खोद कर निकला गया होगा और इस कार्य में करीब १०० साल का वक़्त लगना चाहिये था| पर ताज्जुब की बात यह है कि इस मंदिर का निर्माण १८ साल में ही पूरा कर लिया गया था|कैलाशनाथ मंदिर में कई गुप्त रास्तें, पानी जमा करने और निकासी की तकनीक के साथ कई खूबसूरत नक्काशियां है, जिसे सिर्फ एक ही पहाड़ को कांटते हुए बनाया गया है| 

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बोरोबुदुर 

इंडोनेशिया के मजलांग नामक जगह पर स्थित और ९ वी शताब्दी में बना यह दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर है| चौरस आकार में बना यह मंदिर चारों तरफ से ४०३ फ़ीट की लम्बाई और चौड़ाई का है| एक के ऊपर एक ९ परतों में बना इस मंदिर में ५०४ बुद्ध की मूर्तियां है और हर एक मूर्ति एक स्तूप के अंदर मौजूद है|borobudur-temple-७-अजूबों-में-शामिल-करने-लायक-है-ये-जगहें-फिर-भी-नहीं-है-शामिलअजीब बात यह है कि ९ परतों में बैठाया गया यह मंदिर बनाते समय किसी भी चिपकाने वाले पदार्थ जैसे सीमेंट और चुना इनका बिलकुल भी उपयोग नहीं किया गया है| ये सारे पत्थर एक के ऊपर एक अपने अपने वजन के वजह से चिपके हुए है| एक समय यह मंदिर एक ज्वालामुखी के फटने पर उस ज्वालामुखी की राख में दबकर गुम हो गया था|borobudur-temple-७-अजूबों-में-शामिल-करने-लायक-है-ये-जगहें-फिर-भी-नहीं-है-शामिलइसके अलावा इस मंदिर पर कई और आपदाएं भी आयी पर यह मंदिर ज्यों का त्यों बना हुआ है| साल १८१५ में इस मंदिर को एक ब्रिटिश खोजकर्ता ने फिर से खोज निकाला था| साल १९८५ इस मंदिर पर हुए आतंकवादी हमले से भी यह इमारत नहीं गिरी थी|  साल २००६ में इस क्षेत्र में आये भूकंप, जिसकी त्रीवता ६.२ तक थी, वह भी मंदिर का कुछ नहीं बिगाड़ पाया|
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